नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे वैल्यूएबल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े एक मामले की सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। यह मामला रिलायंस इंडस्ट्रीज की एक सहायक कंपनी रिलायंस कमर्शियल डीलर्स लिमिटेड से जुड़ा है। टैक्स विभाग की मांग है कि इस कंपनी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चार्टर फ्लाइट सर्विसेज पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए। यह कंपनी रिलायंस के अधिकारियों और कर्मचारियों को चार्टर फ्लाइट सर्विसेज देती है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को दो हफ्ते के अंदर लिखित में अपनी बात रखने को कहा है।टैक्स विभाग का कहना है कि रिलायंस कमर्शियल डीलर्स लिमिटेड असल में रिलायंस को विमान किराए पर दे रही है। इसलिए, इस पर ज्यादा टैक्स लगना चाहिए। वहीं, रिलायंस कमर्शियल डीलर्स लिमिटेड का कहना है कि वह सिर्फ यात्रियों को चार्टर फ्लाइट से ले जा रही है। इसलिए, उस पर सामान्य हवाई परिवहन सेवाओं की तरह कम टैक्स लगना चाहिए। मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस मनोज मिश्रा और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इस मामले में रिलायंस कमर्शियल डीलर्स लिमिटेड को नोटिस जारी किया है।क्यों जरूरी है मामला?
जस्टिस मिश्रा ने कहा कि यह एक अहम मुद्दा है जिस पर विचार करना और फैसला करना जरूरी है। इसमें कानून की व्याख्या और वर्गीकरण से जुड़ा एक सीधा सवाल शामिल है। अगर सुप्रीम कोर्ट टैक्स विभाग के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो कंपनियों के लिए चार्टर सर्विसेज का इस्तेमाल करना महंगा हो जाएगा। उन्हें पुराने टैक्स भी भरने पड़ सकते हैं और आगे भी ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है। इससे अधिकारियों के लिए प्राइवेट जेट का इस्तेमाल करना महंगा हो जाएगा।DGCA के नियमों के अनुसार नॉन-शेड्यूल एयर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज (पैसेंजर) में यात्रियों, मेल या सामान को बिना किसी तय समय सारणी के ले जाया जाता है। ये सेवाएं चार्टर या डिमांड पर दी जाती हैं। ऐसे ऑपरेटरों के पास नॉन-शेड्यूल्ड ऑपरेटर परमिट (NSOP) होता है। इससे वे ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से कभी भी उड़ान भर सकते हैं। अभी पैसेंजर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज पर सामान्य एयरलाइनों की तरह कम टैक्स लगता है। इकॉनमी क्लास के लिए जीएसटी 5% हैं। वहीं विमान किराए पर देने या लीज पर देने पर ज्यादा टैक्स (18% जीएसटी) लगता है।