सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रन ने AMU कुलपति की नियुक्ति संबंधी याचिका पर सुनवाई से खुद को किया अलग, जानिए कारण

Updated on 19-08-2025 04:32 PM
अलीगढ़: उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहली महिला कुलपति प्रो. नईमा खातून की नियुक्ति का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अब इस केस की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने खुद को अलग कर लिया। जस्टिस चंद्रन ने सोमवार को दायर याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग करने के बारे में जानकारी दी। इसको लेकर उन्होंने कारणों को भी स्पष्ट किया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट प्रो. मुजफ्फर उरुज रब्बानी और प्रो. फैजान मुस्तफा की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई सुनवाई

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कुलपति की नियुक्ति संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। दरअसल, हाई कोर्ट ने एएमयू वीसी के तौर पर प्रो. नईमा खातून की नियुक्ति को सही ठहराया था। हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई के दौरान कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान कुलपति के पति प्रो. मोहम्मद गुलरेज उनकी नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान कार्यवाहक वाइस चांसलर थे। उनका चयन प्रक्रिया में शामिल होना ठीक नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि एएमयू के कुलपति पद के लिए प्रो. नईमा खातून को प्रो. गुलरेज का महत्वपूर्ण वोट मिला। इससे वह कुलपति बनी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले में कड़ी टिप्पणी की है
चीफ जस्टिस ने सुनवाई के क्रम में कहा कि आदर्श रूप से कुलपति को नियुक्ति प्रक्रिया में भाग नहीं लेना चाहिए था। उनकी जगह यूनवर्सिटी के किसी वरिष्ठ सदस्य को इस नियुक्ति प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए था। चयन प्रक्रिया न केवल निष्पक्ष होनी चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए। दरअसल, याचिका में नियुक्ति मामले में हितों के टकराव का मुद्दा उठाया गया है।

जस्टिस चंद्रन हुए अलग

प्रो. नईमा खातून के कुलपति के रूप में नियुक्ति के केस से जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने खुद को अलग करने की पेशकश की। जस्टिस चंद्रन ने कहा कि इसी तरह की चयन प्रक्रिया में विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के रूप में अपनी पिछली भूमिका का हवाला देते हुए मामले से खुद को अलग करने की बात कही। जस्टिस चंद्रन ने कहा कि जब मैंने प्रो. फैजान मुस्तफा का चयन किया था तब मैं सीएनएलयू (राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय संघ) का कुलाधिपति था। इसलिए, मैं खुद को सुनवाई से अलग कर सकता हूं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हमें जस्टिस चंद्रन पर पूरा भरोसा है। सुनवाई से अलग होने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप पूरी तरह से निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, चीफ जस्टिस ने कहा कि इस मामले में मेरे भाई (जस्टिस चंद्रन) को निर्णय लेने दें। इस मामले को उस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें, जिसका जस्टिस चंद्रन हिस्सा नहीं हैं। यह याचिका अब किसी अन्य पीठ के समक्ष जाएगी।

चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एएमयू कुलपति की चयन प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर कुलपतियों की नियुक्ति इसी तरह होती है, तो मैं यह सोचकर कांप उठता हूं कि भविष्य में क्या होगा। उन्होंने दावा किया कि दो महत्वपूर्ण वोटों के कारण परिणाम प्रभावित हुआ। इसमें एक तत्कालीन कुलपति का था। कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर उन दो वोटों को छोड़ दिया जाए, तो उन्हें केवल छह वोट ही मिलते।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने इस दलील का विरोध किया। उन्होंने प्रो. खातून की नियुक्ति की ऐतिहासिकता पर जोर दिया। ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि यह आंशिक रूप से चयन और आंशिक रूप से चुनाव है। हाई कोर्ट भले ही हमारे चुनाव संबंधी तर्क से सहमत न हो, लेकिन उसने उनकी नियुक्ति को बरकरार रखा। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने प्रोवोस्ट जैसी संबंधित नियुक्तियों को चुनौती नहीं दी थी।

दूसरी ओर, इस मामले में कहा कि आपत्तियां केवल आशंकित पूर्वाग्रह पर आधारित थीं। हालांकि, चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि आदर्श रूप से कुलपति को मतदान प्रक्रिया में भाग लेने से बचना चाहिए था। उन्होंने आगे कहा कि कॉलेजियम के फैसलों में भी अगर ऐसी स्थिति आती है, तो हम खुद को इससे अलग कर लेते हैं।


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