फिलिस्तीन में कभी लौट पाएगी शांति, गाजा में युद्धविराम के बाद क्या है आगे की राह? एक्‍सपर्ट से समझें

Updated on 19-11-2025 01:37 PM
तेल अवीव: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने फलस्तीन के लिए एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया है, जिससे शांति की कुछ संभावना बन सकती है। आम सहमति जैसी कोई चीज इस प्रस्ताव के पीछे भी नहीं थी। सुरक्षा परिषद के कुल 15 सदस्यों में से दो, चीन और रूस ने इस प्रस्ताव पर वोटिंग का बहिष्कार किया। विरोध करने की स्थिति में भी वे नहीं थे, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र की ज्यादातर सत्ताएं अभी फलस्तीन में हर कीमत पर शांति चाहती हैं। रूस और चीन, UNSC की स्थायी समिति के सदस्य हैं। उनके विरोध से प्रस्ताव वीटो हो जाता।

अलग फलस्तीन का गठन

यह प्रस्ताव अमेरिका की तरफ से रखा गया था और इंटरनैशनल मीडिया में इसे 'ट्रंप प्रपोजल' भी कहा जा रहा था। इसकी चिंता का विषय गाजा पट्टी है, हालांकि आगे कभी अलग फलस्तीन के गठन की संभावना का जिक्र भी इसमें है।

गाजा पट्टी की चिंता

दो ठोस बिंदु इस प्रस्ताव की धुरी हैं। एक, 'बोर्ड ऑफ पीस' नाम की एक संक्रमणकालीन संस्था गठित करना, जो गाजा पट्टी का प्रशासन देखेगी, साथ ही वहां मानवीय सहायता कार्यों की देखरेख करते हुए गाजा के पुनर्निर्माण और उसके आर्थिक पुनरुद्धार की व्यवस्था भी करेगी। दूसरा, एक 'International Stabilization Force (ISF)' का गठन, जो इजिप्ट और इस्राइल से तालमेल बिठाते हुए गाजा का पूर्ण निःशस्त्रीकरण करेगी।

इंटरनैशनल फोर्स

कोई कह सकता है कि दोनों प्रस्तावों में बुराई क्या है, कोई भी शांतिप्रिय शक्ति इनका विरोध कैसे कर सकती है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए एक नजर 'International Stabilization Force' के गठन और उसके कामकाज की संभावित प्रक्रिया पर डाली जाए। पहली बात तो यह कि संयुक्त राष्ट्र की 'पीस कीपिंग फोर्स' जैसी कोई तटस्थ शक्ति यह नहीं होने जा रही। न तो इसके गठन में संयुक्त राष्ट्र की कोई भूमिका होगी, न ही उसकी ओर से इसके खर्चे उठाए जाएंगे। ऐसे में उसके नियमों से संचालित होने की उम्मीद भी इससे नहीं की जा सकती।

नीयत पर संदेह

अभी, यह प्रस्ताव आने के बाद भी जिस तरह से फलस्तीनी इलाकों पर इस्राइल की हवाई बमबारी जारी है, उसे देखते हुए यह अंदेशा गलत नहीं लगता कि इसमें शामिल सैनिक फलस्तीनियों के आंसू पोंछने के बजाय उन्हें निहत्था करने में ही जुटेंगे। रही बात 'बोर्ड ऑफ पीस' की तो इसकी भूमिका का अंदाजा इसकी सदस्यता और कामकाज का ढांचा तय हो जाने के बाद ही लग पाएगा।

यूरोप का दबाव

बहरहाल, UNSC के इस प्रस्ताव से हालात थोड़े तो बेहतर होंगे ही। इस्राइल की कोशिश थी कि अलग फलस्तीन का जिक्र इस प्रस्ताव में न आने पाए। ट्रंप की राय भी हमेशा से यही रही है। बावजूद इसके, यूरोपीय देशों की ओर से स्वतंत्र फलस्तीन को मान्यता देने और अरब देशों के दबाव में आकर अलग फलस्तीन वाली बात उन्हें अपने प्रस्ताव में जोड़नी पड़ी।

खाड़ी देशों का रोल

यूरोपीय देश और अमेरिका के करीबी समझे जाने वाले अरब मुल्क अगर आगे भी इसी तरह सक्रिय रहें तो 'बोर्ड ऑफ पीस' और 'International Stabilization Force', दोनों को इस्राइल की जेबी संस्था बनने से रोका जा सकता है। बहरहाल, हमास या उसकी समर्थक सरकारों को अगर लगता हो कि गाजा को फिर पहले जैसी किलेबंदी वाली हालत में लाया जा सकेगा, तो यह उनकी खामखयाली है। 7 सितंबर 2023 को इस्राइली नागरिकों पर किए गए हमले से उन्होंने अपने सारे नैतिक अधिकार खो दिए हैं। आम फलस्तीनियों के साथ दुनिया की पूरी सहानुभूति है, लेकिन उनके हथियारबंद प्रतिनिधि किसी को रास नहीं आएंगे।

रूस-चीन क्या करें

रूस और चीन ने इस प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में वोट भले न डाले हों, लेकिन उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि International Stabilization Force इस्राइल या नैटो की सैन्य शक्ति जैसा नहीं, संयुक्त राष्ट्र की पीस कीपिंग फोर्स जैसा ही व्यवहार करे। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए बुरा समय चल रहा है, लेकिन उनके मानकों से दूर जाना विस्फोटक स्थितियों को जन्म दे सकता है।

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