पेगासस रिपोर्ट सार्वजनिक करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार:कहा- देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी जानकारी सड़क पर चर्चा के लिए नहीं

Updated on 29-04-2025 12:58 PM

पेगासस जासूसी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने मंगलवार को कहा कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी किसी भी रिपोर्ट का खुलासा नहीं किया जाएगा।

बेंच ने कहा- व्यक्तिगत आशंकाओं का समाधान किया जा सकता है, लेकिन टेक्निकल पैनल की रिपोर्ट सड़कों पर चर्चा के लिए नहीं हो सकती। इस बात की जांच करनी होगी कि पैनल की रिपोर्ट किस हद तक व्यक्तियों के साथ साझा की जा सकती है। अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।

क्या है पेगासस जासूसी केस, जिस पर ढाई साल बाद सुनवाई

2021 में न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि भारत सरकार ने 2017 से 2019 के दौरान करीब 300 भारतीयों की जासूसी की। इन लोगों में पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, विपक्ष के नेता और बिजनेसमैन शामिल थे। सरकार ने पेगासस स्पाइवेयर के जरिए इन लोगों के फोन हैक किए थे। इसके बाद ही सरकार के खिलाफ कई लोगों ने कोर्ट में याचिका लगाई थी।

याचिका लगाने वालों में एडवोकेट एमएल शर्मा, राज्यसभा सांसद और पत्रकार जॉन ब्रिटास, हिंदू ग्रुप के डायरेक्टर एन राम, एशियानेट समूह के फाउंडर शशि कुमार, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पत्रकार रुपेश कुमार सिंह, प्रांजय गुहा ठाकुरता, इप्सा शताक्षी, एसएनएम आबिदी और प्रेम शंकर झा शामिल हैं। याचिका दायर होने के बाद 17 अगस्त को कोर्ट ने केंद्र को इस मामले में नोटिस जारी किया था।

याचिका में रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई थी 

याचिकाकर्ता के वकील श्याम दीवान ने 22 अप्रैल को मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया था। उन्होंने कहा था कि 2021 में बनाए गए टेक्निकल पैनल की रिपोर्ट सभी को देने का निर्देश दिया गया था, लेकिन ऐसी कोई रिपोर्ट शेयर नहीं की गई। इसलिए सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के निर्देश दिए जाएं।

दरअसल, 2019 में एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें दावा किया गया था कि भारत सरकार ने नेता, मंत्री, पत्रकार समेत करीब 300 लोगों की जासूसी के लिए पेगासस का इस्तेमाल किया। अगस्त 2021 में यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2021 पेगासस जासूसी मामले की जांच करने के लिए रिटायर्ड जस्टिस आरवी रवींद्रन की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। अगस्त 2022 में इसकी रिपोर्ट आई। इसमें कहा गया था- जांचे गए किसी भी मोबाइल में पेगासस स्पाइवेयर नहीं मिला।

केंद्र सरकार ने अपनी सफाई में कहा था- यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

मामला सामने आने के बाद सरकार ने सभी आरोपों को निराधार बताया था। इलेक्ट्रॉनिक्स और IT मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी ने दो पन्नों के एफिडेविट में कहा था कि भारत एक मजबूत लोकतंत्र है और अपने नागरिकों के निजता के अधिकार के लिए पूरी तरह समर्पित है। सरकार पर जो जासूसी के आरोप लग रहे हैं वो बेबुनियाद हैं।

कोर्ट से नोटिस मिलने के बाद केंद्र ने कहा कि वह सारी जानकारी एक एक्सपर्ट कमेटी के सामने रखने को तैयार है। राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए वो इसे कोर्ट के सामने पब्लिक नहीं कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2021 में बनाई थी जांच कमेटी

कई पत्रकारों और एक्टिविस्ट्स की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2021 को एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी। कमेटी बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर किसी की प्राइवेसी की रक्षा होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आरवी रवींद्रन इसके अध्यक्ष बनाए गए थे।

कमेटी में अध्यक्ष जस्टिस रवींद्रन के साथ पूर्व IPS अफसर आलोक जोशी और डॉक्टर संदीप ओबेरॉय शामिल रहे। डॉक्टर ओबेरॉय इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ स्टैंडर्डाइजेशन से जुड़े थे। अन्य सदस्यों में नवीन कुमार चौधरी, प्रभारण पी और अश्विन अनिल गुमास्ते शामिल रहे।

NYT ने किया था खुलासा- भारत ने 2017 में इजराइल से खरीदा था

भारत सरकार ने 2017 में इजराइली कंपनी NSO ग्रुप से जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस खरीदा था। इस सॉफ्टवेयर को 2 अरब डॉलर (करीब 15 हजार करोड़ रुपए) की डिफेंस डील में खरीदा गया था। इसी डील में भारत ने एक मिसाइल सिस्टम और कुछ हथियार भी खरीदे थे। इस बात का खुलासा अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में किया था।


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